हिन्दुस्तान कभी भी गाँधी का देश नहीं था..!
हिन्दुस्तान टाइम्स के राजनैतिक संपादक एवं देश के गुणी पत्रकार श्री विनोद शर्मा जी ने अपने फेसबुक पेज पर पूछा कि क्या ये देश आज भी गाँधी देश है ? सवाल जिस लहजे में पूछा गया उससे साफ है कि इशारा देश की वर्तमान आर्थिक, सामाजिक एवं राजनैतिक परिस्थियों की ओर था..! और आसान शब्दों में कहूँ तो धर्मों, जातियों, भाषाओं व क्षेत्रीय आधार पर बटे विभिन्न समुहों के बीच बढ़ते अविश्वास एवं उसमें देश की सरकारों रुख की ओर था..! निःसंदेह कई मामलों में परिस्थियाँ पहले से अधिक ख़राब हुईं हैं और इस लिहाज से सोचें तो ये देश गाँधी के विचारों के विपरीत आगे बढ़ता दिख रहा है, उनके शब्दों में कहें तो शायद ये देश गाँधी का देश नहीं बचा..!
मगर सवाल ये है कि देश कब गाँधी का देश था..?
तब जब अंग्रेजी हुकूमत अपनी दमनकारी नीतियों से देश के निम्न वर्ग का शोषण कर रही थी..! या तब जब लगभग सारा देश गाँधी के नेतृत्व में मुल्क की आजादी के लिए अंग्रेजों से लोहा ले रहा था, लाठियां, डंडे यहाँ तक की गोलियाँ खा रहा था ..! या फिर आज़ादी मिलने के ठीक पहले जब भारत भूमि अपने ही नागरिकों के खून से सनी थी, और इसबार कोई और नहीं, धार्मिक आधार पर बटे या बाँट दिए गए हम लोग ही एक दूसरे को मार-काट रहे थे..! ये देश तो उस दिन भी गाँधी का देश नहीं था, जब नेहरू 15 अगस्त 1947 की मध्य रात्रि को अपने ऐतिहासिक भाषण में घोषणा कर रहे थे कि "भारत लंबी निद्रा और संघर्ष के बाद; आगे के लिए पुन: जागृत, जीवंत, मुक्त और स्वतंत्र खड़ा है." क्यूँ कि उसी समय हमेशा की तरह कोई, दिल्ली के ऐतिहासिक व बहुप्रतीक्षित उत्सव से दूर कोलकाता में दंगों की आग को बुझाने की कोशिश कर रहा था और शायद इस देश को गाँधी का देश बनाने की कोशिश कर रहा था, वो गाँधी ही थे ..! और तब तो कदापि नहीं जब आज़ाद भारत की दिल्ली सुदूर हिंदुस्तान के गाँवों में रहने वाले शोषित व कमजोर तबके को आर्थिक एवं सामाजिक सुरक्षा का वादा कर रही थी, तब उसी दिल्ली की एक ठंडी शाम में गाँधी को उनके अनुयायिओं के बीच गोली मार दी जाती है...! और समूचा देश भावनात्मक रूप से टूट जाता है, और पूरा विश्व दुःख की इस घड़ी में गाँधी को अपने-अपने तरीकों से श्रद्धांजलि देता है..!
गाँधी के चले जाने के बाद, इस देश में गाँधी का एक नया सफर शुरू होता है. गाँधी भारतीय मुद्रा में स्थान पा लेते हैं..! पार्कों, चौराहों और सरकारी भवनों में उनकी प्रतिमा लगाई जाने लगती है..! सरकारी योजनाओं एवं शहरों के मुख्य मार्गों को गाँधी का नाम दिया जाता है..! इतना ही नहीं आँगनवाडी से लेकर विश्वविद्यालयों तक गाँधी को पढ़ाया जाने लगता, जो कि आज भी बदस्तूर जारी है..! और इस तरह इस देश को गाँधी का देश बनाने की होड़ में हम इसे गाँधी के विचारों और सपनों से दूर, गाँधी के नाम व फोटो वाला देश बनाने लगते है..! और इसे ही हम गाँधी का देश होना समझते हैं और गाँधी का देश होने की घोषणा करते हुए इस बहस से दूर हो जाना चाहते है..!
मगर जब दुनिया का अधिकतर हिस्सा, हिंसा और आतंक से त्रस्त हो तब शांति की प्रतिस्थापना के लिए गाँधी और उनकी अहिंसक जीवशैली सहज ही याद आने लगती है. भारत जैसे मुल्क में कई बार गाँधी का मुल्क बनने की इच्छाएँ जाग्रत होने लगती हैं..! मगर अफ़सोस इससे अधिक हम आगे नहीं बढ़ते या यूँ कहें की राजनीती हमें बढ़ने नहीं देती..! धीमा ही सही, अगर हम गाँधी का देश बनने की प्रक्रियाँ आने लगें तो ये हमारी सही मायनों में जीत होगी..जीत होगी इन्सानियत की ..भाईचारे की.. और गाँधी की भी..!

Comments
Post a Comment